चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार नहीं किया था। उन्होंने साफ किया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कोई रिट याचिका दाखिल नहीं हुई थी।
साथ ही उन्होंने उन मीडिया रिपोर्टों को गैर जिम्मेदार रिपोर्टिंग बताया, जिनमें दावा किया गया था कि CJP के प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़े मामले की सुनवाई से उन्होंने इनकार कर दिया था।
उन्होंने कहा- मीडिया ने गलत रिपोर्ट किया कि मैंने मामले को सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया। पिछले दो दिनों से पूरी तरह गलत बात कही जा रही है कि मामला दाखिल किया गया था। जबकि एक भी पन्ना दाखिल नहीं हुआ था। यह सिर्फ एक प्रतिनिधित्व था, जिसे मिश्रा या किसी अन्य व्यक्ति ने भेजा था। पहले कहा था- हमारे पास वीडियो देखने का समय नहीं है इससे पहले बुधवार को वकील नरेंद्र मिश्रा ने दिल्ली में CJP के नेतृत्व वाले प्रदर्शन के दौरान पुलिस ज्यादती के आरोपों पर मौखिक रूप से तत्काल सुनवाई की मांग की थी। उस समय CJI, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह अनुरोध रखा गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया था। CJI सूर्यकांत ने कहा था- हमें वीडियो देखने में कोई रुचि नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है। जब वकील ने छात्रों के साथ मारपीट के वीडियो देखने का दूसरी बार अनुरोध किया तो CJI ने कहा- हमारा और अपना समय बर्बाद मत कीजिए। CJI के बयान से बनी कॉकरोच जनता पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत मई 2026 में CJI सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद हुई थी। इसे सोशल मीडिया पर बनाया गया। देखते ही देखते लाखों फॉलोअर्स बढ़ गए। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच 15 जनवरी को वकील संजय दुबे की दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता सीनियर वकील का दर्जा पाना चाहता था। जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या सीनियर एडवोकेट का टैग सिर्फ एक स्टेटस सिंबल है या न्याय व्यवस्था में भागीदारी का एक जरिया। CJI सूर्यकांत ने तब कहा था, कॉकरोच की तरह बहुत से युवा ऐसे हैं, जिन्हें इस पेशे में रोजगार नहीं मिल रहा है। वे सोशल मीडिया और RTI एक्टिविज्म बन रहे हैं। हजारों लोग ऐसे हैं जो काले चोगे पहनकर घूम रहे हैं, लेकिन उनकी डिग्रियों पर गंभीर संदेह है। —————————- ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- गाली देना हर बार अश्लीलता नहीं होती:अभद्र भाषा और अश्लीलता अलग, मां की गाली भी हर मामले में क्राइम नहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है। शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो। पूरी खबर पढ़ें…
